भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Awadhi Sahitya-Kosh (Hindi-Hindi) (LU)

Lucknow University

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जंभनाथ

इनका जन्म नागौर (जोधपुर) राजस्थान के पीपासर नामक गाँव में सं. १५०८ में हुआ था। इनके पिता का नाम लोहित परमार और माता का नाम हाँसी देवी था। इनकी कई स्फुट अवधी रचनाएँ मिलती हैं। इनकी मृत्यु सं. १५८० के लगभग हो गई थी।

जगत सिंह

ये गोण्डा नामक ग्राम के रहने वाले थे, जो सरयू के उत्तर तट पर स्थित था। इनके पिता का नाम दिग्विजय सिंह था। ये विसेन क्षत्रिय थे। इनकी दो रचनाएँ हैं – साहित्य सुधानिधि और चित्र मीमांसा। ये रीतिबद्ध कवि थे। इन दोनों प्रतियों का लिपिकाल सं. १९०७ है। इनकी कविता में अवधी का प्राचुर्य है।

जगदम्बाप्रसाद मिश्र ‘हितैषी’

हितैषी जी कानपुर के निवासी थे। इनका जन्म सन् १८९५ में एवं मृत्यु सन् १९५८ में हुई थी। इन्होंने कवित्त, सवैया, छंदों का अधिक प्रयोग किया है। इनके काव्य में बैसवारी भाषा एवं संस्कृति की झलक मिलती है। इनकी अवधी रचनाएँ हैं- मकाई की खेती, बैसवारायन आदि।

जगदीश अवस्थी

ग्राम कोटरा, सीतापुर के निवासी अवस्थी जी अवधी के एक निष्ठावान साहित्यकार हैं, जिन्होंने अपनी लेखनी के माध्यम से अवधी भाषा की सेवा करने का संकल्प लिया है।

जगदीश नारायण तिवारी ’लोकेश’

लोकेश जी राजकीय पॉलीटेक्नीक, फैजाबाद में कार्यरत हैं। इन्होंने तमाम साहित्य सर्जना के साथ-साथ अवधी भाषा के प्रति भी अपनी श्रद्धा प्रकट की है, जिसका उदाहरण ‘तुलसी-स्तवन’ नामक काव्य खण्ड से दिया जा सकता है। इस कविता में तुलसी की गौरव गाथा वर्णित है।

जगदीश प्रसाद मिश्र

शोरागंज, रायबरेली निवासी मिश्र जी अवधी भाषा के अल्पख्यात कवि हैं।

जगदीश श्रीवास्तव

फैजाबाद निवासी श्रीवास्तव जी अवधी साहित्यकार हैं।

जगदीश सिंह ‘नीरद’

नीरद जी का जन्म १ जनवरी सन् १९५२ ई. को ग्राम कुबरी, जनपद बराबंकी में हुआ था। इनके पिता का नाग हौसिला सिंह है। हिन्दी से एम.ए. तक शिक्षा ग्रहण करने के बाद अध्यापन कर्म से सम्बद्ध हो गये। नीरद जी अवध भारती समिति के कोषाध्यक्ष एवं ‘जोंधइया’ पत्रिका के उप संपादक रह चुके हैं। इनकी कृतियाँ हैं – छठा पाण्डव, बदलता परिवेश, सती की शक्ति, खून की छींटें।

जगधर

ये अच्छे अवधी गद्य लेखक हैं। फैजाबाद से प्रकाशित जनमोर्चा में इनकी रचनायें प्रायः छपती हैं।

जगन्नाथ

ये आधुनिक काल की बैसवारी अवधी से सम्बद्ध साहित्यकार हैं।

जगन्नाथ अवस्थी

ये सुमेरपुर (बैसवारा क्षेत्र) के निवासी थे। इनका अवधी काव्य अप्रकाशित है। ये भारतेन्दु हरिश्चन्द्र के समकालीन थे।

जगमोहन कपूर ‘सरस’

सन् १९३८ में जनमें सीतापुर नगर के निवासी सरस जी अवधी साहित्यकार हैं। इनकी अवधी सेवा अत्यन्त उच्चकोटि की रही है। सरस जी अनेक उच्च पदों पर रह चुके हैं। इनकी अवधी रचनाएँ हैं- ‘छब्बीस जनवरी’, हे बापू तुमको राम-राम, पन्द्रह अगस्त, लाम पर, और हमार भारत। इन्होंने खड़ी बोली में भी काफी महत्वपूर्ण सृजन किया है।

जनकपुर-माहात्म्य

यह मिथिलावासी सीताराम प्रणीत विष्णु पुराण पर आधारित प्रबंध काव्य है। इसकी रचना दोहा-चौपाई के माध्यम से सन् १९०० में हुई है।

जनकुंज

जनकुंज के विषय में अधिक ज्ञात नहीं हैं। इनकी एक अवधी रचना “उषाचरित्र’ मिलती है। इसकी रचना सं. १७८२ में हुई थी। ‘उषाचरित्र’ में उषा-अनिरुद्ध की प्रणय कथा वर्णित है। इसकी भाषा अवधी है।

जनार्दन प्रसाद ’मधुकर’

लखनऊ जनपद के निवासी मधुकर जी अवधी के ख्याति प्राप्त साहित्यकार हैं। इन्होंने अपनी साहित्य सर्जना से समाज को नयी दिशा देने का भरसक प्रयास किया है।

जनेऊ/जनौ

यह यज्ञोपवीत संस्कार के समय स्त्रियों द्वारा गाया जाने वाला प्रसिद्ध अवधी लोकगीत है। ये गीत प्रायः बड़े भावपूर्ण होते हैं। इन अवधी गीतों में अवध का लोकजीवन, उसकी सुरुचि तथा कलात्मक प्रकृति रूपायित है। ये गीत वाद्य यंत्रों के साथ नहीं गाये जाते।

जयगोविंद

ये द्विवेदी युग के अवधी साहित्यकारों में से एक हैं। इन्होंने पर्याप्त अवधी काव्य सृजित किया है।

जयदेव शर्मा ‘कमल’

‘तुम हथियार गढ़ौ’ नामक इन्होंने प्रेरणापरक अवधी रचना की है।

जानकवि

इनका पूरा नाम न्यामत खाँ है। ‘जान’ उपनाम है। इनके पिता का नाम अलफ खाँ था। इनके ग्रन्थों की संख्या ५६ है। वस्तुतः जानकवि प्रेमगाथा परंपरा के कवि हैं, पर इनका ‘कायमरासो’ वीरकाव्य परंपरा में गण्यमान है। ‘कायम रासो’ जानकवि के खानदान का ऐतिहासिक इतिवृत्त भी प्रस्तुत करता है।

जानकी चरण

इनका समय सं. १८७७ स्वीकार किया गया है। इन्होंने अवधी भाषा में पर्याप्त सृजन किया है। इनके अवधी ग्रंथ हैं- प्रेम प्रधान, सियाराम-रस मंजरी।
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