भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Awadhi Sahitya-Kosh (Hindi-Hindi) (LU)

Lucknow University

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चंद्रशेखर मिश्र ‘चण्डूल’

चण्डूल जी आधुनिक अवधी काव्य की हास्य-व्यंग्य-परम्परा में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं। इनका परिचयात्मक विवरण अप्राप्त है।

चकल्लस

यह बलभद्र प्रसाद दीक्षित ‘पढ़ीस’ जी की श्रेष्ठ अवधी काव्य कृति है। इसमें तुकान्त, अतुकान्त लगभग ३७ कविताओं का संग्रह है, जिसका प्रकाशन सन् १९३३ में हुआ है। यह काव्य कृति अनेक दृष्टियों से महिमामण्डित है। इस संग्रह में अवध के जनजीवन की मर्मच्छवियाँ अंकित हैं। कविताओं में जनवादी चेतना का प्रखर स्वर है, साथ ही अनुभूति की प्रगाढ़ता और सूक्ष्म पर्यवेक्षण की शक्ति भी। विषय-वस्तु, भाव वैविध्य, नवीन छन्द योजना तथा युगीन काव्य प्रवृत्तियों की प्रतिनिधि कृति है – चकल्लस। इनकी रचना का मूल उद्देश्य अवधी भाषा को प्रश्रय देकर ग्राम्य संस्कृति को उजागर करना था। इस संकलन की कविताओं में सामाजिक कुरीतियों, पाखण्ड, पाश्चात्य संस्कृति, सामंती जीवन,आधुनिक फैशन, जाति-पाति आदि का विरोध मुखरित हुआ है। इन कविताओं की भाषा ठेठ अवधी है। इनमें तद्भव शब्दों का ही बाहुल्य है। बोलचाल की भाषा का सहज सौन्दर्य इसमें समाहित हैं।

चतुर्भुज शर्मा

इनका जन्म सन् १९१० में बीहट वीरम के निकट ग्राम राजपुर खुर्द जिला सीतापुर में हुआ था। गजोधर दीक्षित इनके पिता थे। इण्टरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण करने के पश्चात् इन्होंने गन्ना विभाग में सुपरवाइजर के पद पर नौकरी कर ली। हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत के साथ उर्दू और फारसी के भी ज्ञाता हैं चतुर्भुज शर्मा। इनकी अवधी रचनायें हैं – बजरंग-बावनी, नारद मोह, किसान की अरदास, धनुष भंग, कुत्ता-भेड़हा की लड़ाई, बाल रामायण, र्‌याल-प्याल, नहर का मुकदमा, सरदार पटेल, महात्मा गांधी का निधन, स्वतंत्रता दिवस, पोक्कन पाण्डे, गोधूली, यहिया खाँ, मधई काका की चौपारि, मेघनाथ वध, इत्यादि। इनकी समस्त अवधी सेवाओं पर उ.प्र. हिन्दी संस्थान ने इन्हें जायसी (नामित) पुरस्कार से सम्मानित किया है। भाषा में बैसवारी अवधी की स्पष्ट झलक मिलती है।

चन्द्रभान सिंह

इनका जन्म सन् १९७४ में ग्राम बरउवाँ, जनपद रायबरेली में हुआ था। ये होली-चहली, छंद के लिए प्रसिद्ध हैं। इनके लोकगीत रामकृष्ण कथा पर आधृत हैं। भाषा ठेठ अवधी है। ‘कृष्ण-सुदामा’ नामक इनका लोकगीत संग्रह है, जो अभी अप्रकाशित है।

चन्द्रभूषण त्रिवेदी “रमई काका”

आधुनिक अवधी कविता में श्री चन्द्रभूषण त्रिवेदी “रमई काका” का शीर्षस्थ स्थान है। महाकवि तुलसीदास के बाद ये अवधी के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि हैं। इनका हास्य-व्यंग्य-विनोद अति विशिष्ट हैं। काका के काव्यसंग्रह हैं – ‘भिनसार’, ‘बौछार’, ‘फुहार’, ‘गुलछर्रा’, नेताजी एवं हरपाती तरवारि आदि। इनका काव्य, भाव और शिल्प दोनों दृष्टियों से वैविध्यपूर्ण है। इनकी रचनाओं में बैसवारा-जनजीवन की अनेक मर्मच्छवियाँ प्रोद्‍भासित हुई हैं। प्रकृति-परिवेश का एक-एक रूप-रंग उनकी रचनाओं में अन्तर्याप्त हो उठा है। इनका दूसरा महत्त्वपूर्ण पक्ष है- अवध की लोक संस्कृति का दिग्दर्शन। ’काका’ मूलतः ग्रामीण-व्यवस्था एवं कृषि संस्कृति के कवि हैं। अवध ग्रामांचल में व्याप्त गरीबी, भुखमरी, पर्दा-प्रथा, मुकदमेबाजी आदि समस्याओं एवं कुप्रथाओं का समाधान इनकी रचना का विषय रहा है। कृषि कर्म एवं ग्रामोद्योग का इन्होंने पुरजोर समर्थन किया है। इन्होंने अवधी लोकसंस्कृति का बड़ी बारीकी से वर्णन किया है। इनकी कविताओं का काव्य-सौष्ठव विशिष्ट है। इन्होंने जनजीवन में प्रचलित लोकोक्तियों, मुहावरों और ठेठ आंचलिक लहजों (बोली-बानी) का प्रयोग करके अपनी विलक्षण व्यंजनगतिशयता का निर्वाह किया है। ‘रमई काका’ की कविता जितनी भावबहुला है, उतनी शिल्प विविधा भी। इन्होंने छोटी-बड़ी मुक्त कविताओं के अतिरिक्त, गीत, घनाक्षरी, दोहा, सोरठा, कुण्डलियाँ, पद, विरहा, आल्हा आदि छन्दों तथा विभिन्न काव्यरूपों का सफल प्रयोग किया है। भले ही इनकी भाषा में कहीं- कहीं खड़ी बोली तथा भोजपुरी का अवधी रूपांतरण दिखाई देता हो, यों उसमें बैसवारी अवधी का सफल विनियोग हुआ है। ‘काका’ ने लोकरुचि के अनुकूल हास्यरस में अधिक लिखा है, पर श्रृंगार, करुण और वीर रसों में भी इनकी यथेष्ट गति रही है। राष्ट्रीय विभूतियों गाँधी, नेहरू आदि के प्रति इन्होंने अनेक वन्दना गीत लिखे हैं। राजनीतिक समस्याओं पर भी ‘काका’ ने पर्याप्त चिंतन किया है। पाकिस्तानी, चीनी आक्रमण के दौरान इन्होंने ‘आल्हा’ शैली में अनेक प्रेरणादायक गीत लिखे। अवधी गद्य में ‘काका’ की महती भूमिका रही है। ‘रतौंधी’, ‘बहिरे बोधन बाबा’ नामक हास्य एकांकी (ध्वनि रूपक) संकलन द्वारा इन्होंने अवधी नाटक के क्षेत्र में पहल की है। वस्तुतः ये आधुनिक अवधी के कीर्तिस्तम्भ हैं।

चन्द्रशेखर ‘चण्डूल’

चण्डूल जी लखनऊ जनपद के बंथरा क्षेत्र के निवासी हैं। साहित्य क्षेत्र में उतरने के लिए इन्होंने अवधी को अपनी मूल भाषा के रूप में स्वीकार किया है।

चन्द्रशेखर पाण्डेय ‘चन्द्रमणि’

इनका जन्म बन्नावाँ, रायबरेली में १९०८ में हुआ था। इन्होंने अश्लील लोकगीतों के विरोध में लोकगीतों का एक संग्रह ‘होली का हुलम्बा’ सृजित किया। इस संग्रह की भाषा अवधी है। इनकी मृत्यु सन् १९८२ में हुई।

चन्द्रशेखर बाजपेयी

इनका जन्म पौष शुक्ल पक्ष दशमी संवत् १८५५ को असनी के निकट मुअज्जमाबाद जिला फतेहपुर में हुआ था। इनके पिता का नाम मनीराम बाजपेयी था। इनकी प्रमुख कृतियाँ हैं – रसिक विनोद, हम्मीर हठ, विवेक विलास, हरिभक्ति विलास, नख – शिख, गुरु पंचाशिका, वृन्दावन शतक, माधवी वसंत आदि। हम्मीर हठ (वीर-काव्य) इनकी सर्वाधिक लोकप्रिय रचना है। सं. १९३२ में इनका निधन हो गया। ये संस्कृत के अच्छे विद्वान थे। इनकी अनेक अवधी कविताएँ हैं। ये अपनी कविताओं में ‘शेखर’ उपनाम का प्रयोग करते थे। इन्हें पटियाला, कश्मीर, जोधपुर आदि रियासतों में आश्रय प्राप्त था। अवधी के विकास में इनका योगदान उल्लेखनीय है।

चन्द्रशेखर सिंह ‘चन्द्र’

लखनऊ जनपद के ग्राम भवानीपुर पो. इन्दौरा बाग निवासी श्री रघुनाथ सिंह चौहान के सुपुत्र चन्द्र का जन्म १६ अगस्त सन् १९३१ को हुआ। इन्होंने अवधी के साथ-साथ खड़ी बोली में भी रचनाएँ की हैं। इनके काव्यसंग्रह हैं-छंदमाला भाग-१, छंदमाला भाग-२, गीतमंजरी, लंका-संग्राम। इनकी स्फुट रचनाएँ अनेक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रहती हैं।

चन्द्रिका प्रसाद बाजपेयी ‘कौतुक’

इनका जन्म सं. १९६४ में जिला रायबरेली के ग्राम बेहटा कला के ‘बाजपेयी खेरा’ में हुआ था। इनके पिताजी का नाम निजानन्द बाजपेयी था। रायबरेली में श्री रामावतार शुक्ल द्वारा स्थापित ‘चातुर मंडल’ के ये प्रकाशमान नक्षत्र थे। इसके अतिरिक्त रायबरेली के स्वतंत्रता संग्राम तथा राष्ट्रीय कविता के क्षेत्र में कौतुक जी की भूमिका महत्त्वपूर्ण है। समस्यापूर्ति के कवि सम्मेलनों में ये कई बार पुरस्कृत हो चुके हैं। इन्होंने अनेक प्रकार की कवितायें की हैं। सामाजिक-सामयिक विकृतियों पर इनकी लेखनी साधिकार चली है। इनकी रचनाओं के संकलन एवं संग्रह की आवश्यकता है। इनका निधन सं. २०३९ में हो गया।

चमरौधा

यह कृपाशंकर मिश्र ‘‘निर्द्वन्दु” द्वारा प्रकाशित काव्य-कृति है। इसमें विभिन्न विषयों से संबंधित अवधी कविताएँ हैं। इसकी भाषा बैसवारी अवधी है, जिसमें ठेठ देशज शब्दों की गूढार्थ व्यंजना दिखाई देती है। उल्लेखनीय कविताएँ हैं – सिपाही की चिट्ठी, किसानी आदि।

चरनदास

ये कृष्ण-काव्य-परम्परा से सम्बद्ध कवि हैं। ब्रजमण्डल के निवासी होने के बावजूद इन्होंने अवधी भाषा में सं. १७६० में ‘ब्रजचरित’ ग्रंथ लिखकर अवधी को जो सम्मान प्रदान किया है, वह प्रशंसनीय है।

चरनदास (संत)

इनका जन्म सं. १७६० में राजपूताना के मेवाण प्रदेश के डेहरा ग्राम में मुरलीधर के घर में हुआ था। पिताजी की मृत्यु के बाद ये ९-१० वर्ष की अवस्था में अपने मातामह के साथ दिल्ली चले आये। इनके प्रसिद्ध ग्रन्थ हैं – ‘ज्ञान स्वरोदय’, ’अष्टांग योग’, ‘पंचोपनिषदसार’, ‘भक्ति-पदार्थ’, ‘अमर लोक’, ’अखण्ड धाम’, ’सन्देह-सागर’, ‘भक्ति-सागर’ आदि। इनके प्रामाणिक २१ ग्रन्थ हैं। इन्होंने अधिकांश ग्रन्थ और साखियाँ अवधी भाषा में रची हैं। कहा जाता है कि इनके ५२ शिष्य थे, जिन्होंने चरनदास जी द्वारा प्रवर्तित चरनदारी सम्प्रदाय की ५२ शाखाएँ स्थापित की।

चर्यागीत

यह मूलतः बौद्ध साहित्य का अंग है। इसमें दिनचर्या का प्रतिफलन होता रहा है। बुद्धचर्या इस दृष्टि से उल्लेखनीय है। ‘चर्यागीतों’ में सिद्धों की मनःस्थिति का प्रतीकात्मक निदर्शन किया गया है। इनमें श्रृंगार, वीभत्स और उत्साह की मार्मिक व्यंजना की गई है। प्राप्त प्रमाणों के अनुसार गीतों में जनभाषा अवधी के बहुत प्रयोग हुए हैं, शायद इसलिए कि दोनों एक ही मूल से संबद्ध हैं।

चहलारी – नरेश

अवधी साहित्य की अमर विभूति गुरुप्रसाद सिंह ‘मृगेश’ जी द्वारा रचित यह आंचलिक इतिहास से ओत-प्रोत एक महाकाव्य है। इसमें राजा बलभद्र सिंह को नायक बनाकर प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की गौरव गाथा वर्णित है।

चहली

अवध प्रदेश में होलिकोत्सव के अवसर पर सवाद्य वृन्दगान के रूप में गाया जाने वाला यह लोकगीत विशेष चहलपहल पूर्ण होने के कारण चहली कहलाता है। इसमें विविध पौराणिक आख्यान उपलब्ध होते हैं।

चाँद भला सब तारन ते

यह गंगाप्रसाद मिश्र कृत अवधी कहानी है, जो ‘पाक्षिक उत्तर प्रदेश’ में प्रकाशित हो चुकी है।

चाकी-काँड़ी

चाकी-काँडी विवाहपूर्व का एक विशिष्ट आयोजन है। यह खाद्यान्न की तैयारी का सूचक है। इस अवसर पर ‘काँड़ी’ पूजन करती हुई स्त्रियाँ इस अवधी लोकगीत का गायन करती हैं।

चान्दायन

यह मुल्ला दाऊद द्वारा रचित प्रथम प्रेमपरक काव्य है। इसमें लोरिक और चन्दा के प्रेम का वर्णन किया गया है। सम्पूर्ण कृति में दोहा, चौपाई छन्दों का प्रयोग मिलता है। चांदायन की भाषा, ठेठ अवधी है। इसमें बैसवारी अवधी और कुछ-कुछ पूर्वी अवधी का प्रयोग दिखाई पड़ता है। इसकी रचना १३७९ ई. में की गई है। सम्प्रति चांदायन के तीन पाठान्तर तथा सम्पादन प्राप्य हैं, जिनमें डॉ. माताप्रसाद गुप्त, डॉ. परमेश्वरी लाल और जयपुर निवासी रावत के प्रकाशन उल्लेखनीय हैं। प्रथम सूफी काव्य और अवधी की सर्वप्राचीन कृति के नाते चांदायन का ऐतिहासिक महत्व है। इसके बहुविध शोधपरक अध्ययन हो चुके हैं, जिससे इस महाकाव्य की गणगरिमा सर्व स्वीकार्य हैं।

चारुचंद्र द्विवेदी

ये रायबरेली के निवासी एवं अवधी भाषा के ख्यातिप्राप्त कवि हैं।
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